नई शिक्षा नीति 2020 और भाषा शिक्षण-मास्टर हंसराज सिंह

भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की घोषणा 21वीं सदी की ज्ञान संबंधी चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए। भारत को एक सशक्त ज्ञान आधारित राष्ट्र बनाने तथा इसे वैश्विक महाशक्ति के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक एवं क्रांतिकारी कदम है। वास्तव में भारत में ऐसे शिक्षा नीति की आवश्यकता थी।
जिस शिक्षा को ग्रहण करने के बाद शारीरिक मानसिक बौद्धिक एवं सांस्कृतिक रूप से, विकसित ऐसे कौशलयुक्त युवाओं का सर्जन हो सके। जिनमें गौरवशाली भारतीय संस्कृति की जीवंतता,भारतीय भाषाओं में प्रवीणता तथा भारतीय दृष्टि के अनुरूप ज्ञान विज्ञान में दक्षता, स्पष्ट रूप से परिलक्षित हो। शिक्षा नीति में भाषा के सामर्थ्य को स्पष्ट रूप से इंगित करते हुए कम से कम कक्षा 5 तक मात्रृभाषा स्थानीय भाषा या क्षेत्रीय भाषा को शिक्षा का माध्यम बनाने पर विशेष बल दिया गया है। इसे आगे कक्षा आठ और उसके आगे भी भारतीय भाषाओं में अध्ययन का प्रावधान किया गया है। इसके साथ ही विद्यालयी, उच्च शिक्षा में भी त्रिभाषा फार्मूले के अंतर्गत देव भाषा संस्कृत तथा भारत की अन्य पारंपरिक भाषाओं में से विकल्प चुनने का प्रावधान है। बाल्यावस्था में मानसिक विकाश की गति तीव्र होती है तथा इस अवस्था में मातृभाषा में अध्ययन से बच्चे के अंदर चिंतन, स्मरण, निर्णय लेने की क्षमता जैसी वृर्तियों का सहज विकास होता है। भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम है तथा संस्कृति की वाहिका है। मातृभाषा में अध्ययन से अपनी भाषा के प्रति ममत्व और आत्मीयता का भाव तो जागेगा ही साथ ही साथ छात्र आगे चलकर विद्धता भाव के साथ अपनी मातृभाषा में पारंगत होंगे तथा भारतीय संस्कृति के सशक्त वाहक होंगे। मौलिक चिंतन किसी और भाषा में नहीं बल्कि अपनी मातृभाषा या स्थानीय भाषा में ही संभव है। मातृभाषा में लिया हुआ ज्ञान संपूर्णता के साथ छात्र के मस्तिक में शत-प्रतिशत स्वीकार्य होता है‌। इस ज्ञान की छाप अमिट होती है। अपनी भाषा ही सारी उन्नतियो का मूलधार है। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने कहा था- निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति का मूल। भाषा के माध्यम से हम दूसरों की संस्कृति से परिचित हो सकते है।किसी संस्कृति के लोगों का दूसरों के साथ बात करना, अपरिचितों से बात करना, बातचीत के तौर तरीकों को भी प्रभावित करती है। एक ही संस्कृति के लोगों में अपनापन, अनुभवों की समझ, उनका लहजा यह सभी संस्कृति के प्रतिबिम्ब और दस्तावेज है। संस्कृति हमारी भाषाओं में समाहित है। भाषा की विभिन्न विधाओं नाटक, संगीत, साहित्य फिल्म आदि की सराहना बिना भाषा के करना कतई संभव नहीं है। इसलिए हमें उस संस्कृति की भाषाओं का संरक्षण व संवर्धन करना होगा। दुर्भाग्य से भारतीय भाषाओं की समुचित ध्यान और देखभाल नहीं हो पाई। जिसके तहत देश में विगत 50 वर्षों में ही 220 भाषाओं को खो दिया। यूनेस्को ने 197 भारतीय भाषाओं को लुप्त प्राय घोषित किया है।

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 

2020 भारतीय भाषाओं को सही अर्थों में प्रतिस्थापित करने की दिशा में विद्यालयों व उच्च शिक्षा में बहुभाषावाद को बढ़ावा देगी। इसमें विद्यालयों में मातृभाषा/ स्थानीय भाषा में पठन-पाठन सुनिश्चित हो सकेगा।

त्रिभाषा फार्मूले के अंतर्गत निश्चित रूप से केंद्र और राज्य सरकारों की पहली जिम्मेदारी होगी कि वह गुणवत्ता युक्त भाषाएं शिक्षकों को तैयार करें। गुरुकुल के समय शिक्षा का माध्यम संस्कृत एवं भारतीय भाषाएं थी। शिक्षा व्यवस्था भारतीय भाषाओं के बल पर सुदृढ़ थी।महान व प्राचीन विश्वविद्यालय तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला भारत में थे। जहां ज्ञान विज्ञान कला दर्शन धर्म आदि की शिक्षा संस्कृत व अन्य भारतीय भाषाओं में दी जाती थी। संस्कृत भाषा के सामर्थ्य और इसकी वैज्ञानिकता को देखते हुए बाबा साहब अंबेडकर इसे राष्ट्रभाषा बनाने के पक्षधर थे त्रिभाषा फार्मूले के अंतर्गत विद्यालय के छात्र भारतीय भाषाओं एवं संस्कृत भाषा में प्रवीणता सुनिश्चित कर सकेंगे। विकसित देशों में भी जैसे अमेरिका ब्रिटेन जर्मनी जापान इजरायल फ्रांस आदि में अपनी एक भाषा है जो उनकी बोलचाल तथा गणित विज्ञान सहित व्यवसाय की भाषा भी है। इन देशों में अपनी भाषा में  पठन-पाठन की अनिवार्यता कर रखी है। युवा निश्चित रूप से ज्ञान की विविध विधाओं का अध्ययन अपनी भाषा में करने से शिक्षा में उत्कृष्टता आएगी। भारतीय मूल्यों, परंपराओं के प्रति समर्पित युवा तैयार होंगे, समर्थ युवाओं के निर्माण से निश्चित ही समर्थक और आत्मनिर्भर भारत का निर्माण होगा। विकासशील से विकसित देश बनने में महती भूमिका निभायेगा।

इस नीति को लागू करने के संबंध में मेरे कुछ सुझाव है।नीति लागू करने से पहले सभी चुनौतियों को पुरा करना चाहिए।पूरी तैयारी होने के बाद ही इसे लागू किया जाए।

पहली चुनौती भाषा शिक्षक तैयार करें।

पाठ्य पुस्तकें तैयार करें। भाषा संस्थान प्रत्येक राज्य में स्थापित हो। भाषाएं प्रशिक्षण से देने हेतु मास्टर ट्रेनर तैयार हो।

 वर्किंग पुस्तकालय सभी विद्यालयों में हो।

भाषाएं प्रशिक्षण शिक्षकों को नियुक्ति दी जाए। आंगनबाड़ी /बालवाड़ी आदि को भी संवारने की जरूरत है। ड्रॉपआउट कम करने, नामांकन वृद्धि, नियमितता, ठहराव बढ़ाने, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए राज्यों का सहयोग आवश्यक है।वित्तीय संसाधन जरूरी है इसके लिए जी डीपी का 6% खर्च करने का इरादा पक्का हो।इसके लिए पक्का विश्वास दिखाना होगा‌

इसके साथ ही मेरे कुछ अनुभव है मैं 30 साल से प्रारंभिक शिक्षा में बच्चों के साथ काम कर रहा हूं। इसलिए मेरा एक निश्चित मानना है कि जिस तरह एक बच्चा अपने घर में 5 साल तक रहकर बिना स्कूल के भाषा सीख रहा होता है। उसी तरीके से विद्यालय में भी उसको भाषा ज्ञान करवाया जाना चाहिए। इस नीति में भी इस बात पर बड़ा फोकस किया गया है कि बच्चों को प्री प्राइमरी लेवल तक आते आते हैं उनका पढ़ना लिखना अच्छा हो जाए, भाषा पर उनकी पकड़ मजबूत हो, अपने मन के विचार, वह लिख सके, मौखिक रूप से प्रस्तुत कर सकें‌। गणित की बुनियादी बातें जोड़ बाकी गुणा भाग अंक पहचान पर उसकी मजबूत पकड़ बन जाए। यह सब हो जाने से उनका फाउंडेशन मजबूत होगा तो निश्चित रूप से आगे की शिक्षा में वह रूचि भी लेगा व जरुर सफल भी होंगे।

इस नीति में इस बात पर बड़ा जोर दिया गया है। शिक्षा को 4 चरणों में बांटा गया है।3वर्ष से लेकर 18वर्ष तक के बच्चों को जोड़ा गया है।  

मेरा मानना है मैं इस तरह से काम करता हूं उसका बच्चों को फायदा भी हुआ है।मेरे को भी अच्छा रिजल्ट मिला है। भाषा शिक्षण मैं संदर्भ पद्धति वाक्य पद्धति, वाक्य से शब्द पर, शब्द से वर्ण पर आता हूं। इस तरह पहले वर्ण पहचान न करवा कर। क्रम को बदलकर बच्चों के साथ काम करेंगे तो उनको वर्ण की पहचान करने मे उनके दिमाग को ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ेगी। बड़ी सरलता से उनके बात समझ में आ जाती है। क्योंकि भाषा कभी टुकड़ों में नही सीखी जाती‌ है। संदर्भ में, वाक्य में, पूरी बात को बच्चा समझता है। भाषा की यह विशेषता होती है इसलिए हमें भाषा की विशेषता/प्रकृति को ध्यान में रखते हुए भाषा को संपूर्णता में सिखाना होगा। इसी तरह हम गणित के भी जो संख्याएं हैं उनको व्यवहार में बच्चा किस तरह उपयोग ले रहा है। व्यवहार में वह जोड़ बाकी गुणा भाग की सहायता से अपने घर का, दूध का हिसाब, अपनी कॉपी किताब पेंसिल का खरीदने, रोजमर्रा का, दैनिक जीवन का सामान लाने का इन सब में वह गणित को अच्छी तरह कर रहा है या नही।यह देखना पड़ेगा। 

इस नीति में दक्षता आधारित अधिगम की बात कही गई है।

उसके साथ ही बच्चों के बस्ते का बोझ भी कम किया गया है। हर शनिवार का दिन सप्ताह में जिसको हम लोग NO BAG DAY कह रहे है। इस नीति में भी इसका उल्लेख किया गया है। क्योंकि शिक्षा के साथ-साथ सहशैक्षणिक गतिविधियाें भी बच्चों का संपूर्ण विकास करने के लिए अतिआवश्यक है।  इस दिन को बच्चों को पढ़ाई के अतिरिक्त वे सब काम विद्यालयों मे करवाए जाएंगे जो उनको अच्छे लगते हो जैसे कहानी लिखना है,सुनना, संगीत,चित्र बनाना, कागज के खिलौने बनाना,नाटक करना और भी कई तरह के खेल खेलना। इन सब के लिए उन बच्चों को खूब सारे अवसर दिए जाएंगे। यह सब काम अगर शिक्षक उत्साह और जोश के साथ करेगा तो निश्चित रूप से यह नीति हमारे देश के लिए एक क्रांतिकारी कदम होगी।

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