प्रेम एक ऐसी चीज है जो हारे हुए व्यक्ति को भी जीता देती है। लेकिन घृणा एक पूरी तरह से सफ़ल हुए व्यक्ति को भी नीचे गिरा देती है।

कौशल किशोर का कविता पाठ 'यह गम अपना, हम सब का साझा' - शतीन्द्रनाथ चौधुरी

अतुल्य हिन्दी के मंच से कौशल किशोर का काव्यपाठ यू-ट्यूब पर सुना। इसका संजीव प्रसारण इसी मंच से किया गया। उन्होंने कोरोना सिरीज़ की अपनी दस कविताएं सुनाईं और फिर पहले की लिखी कुछ महत्वपूर्ण कविताएं और सुनाईं।

भाई कौशल किशोर जी का बहुत बहुत आभार कि उन्होंने कार्यक्रम की शुरुआत कोरोना का ग्रास बनी कवयित्री शुक्ला चौधुरी के लिए  अभी हाल में लिखी अपनी कविता सुनाते हुए उसे कोरोना के शिकार हुए सभी कवि व लेखक मित्रों की स्मृति में समर्पित किया। कार्यक्रम का शीर्षक था 'यह गम अपना, हम सब का साझा'।

मैं खास कर इस बात से अभिभूत हूं कि उन्होंने इस कविता का पाठ करने से पहले शुक्ला की काव्यवस्तु, उनका प्रकृति-प्रेम और चाँद के प्रति उनकी भावात्मक केन्द्रीयता व कलापक्ष की विशेषता को भी रेखांकित किया। उन्होंने शुक्ला के कहानी एवं उपन्यास लेखन का भी उल्लेख कर उन्हें यथोचित सम्मान दिया।
कोरोना सिरीज़ की उनकी कविताएं शीर्षकहीन हैं। कौशल जी कोरोनाग्रस्त होकर तेरह दिन की लड़ाई के बाद बचकर अस्पताल से निकले हैं। उनके अपने कटु-तिक्त अनुभव हैं कि किस प्रकार आदमी अपनों से दूर हो  जाता है, किस प्रकार वह समाज ही नहीं अपने ही परिवार, अपने बच्चों और पत्नी के लिए भी अस्पृश्य हो जाता है... "दोस्तों से आंख नहीं मिला सकता था/किसी को गले नहीं लगा सकता था/...... /महामारी ऐसी आई जो मनुष्य को अकेला कर गयी...... '' बीमारी में या किसी भी संकट में हमें पॉज़िटिव होने को कहा जाता है, पर  " यहां पॉज़िटिव होना अस्पृश्य होना है"।
इस बीमारी की विडम्बना देखिये : " बापू  की सांस बचाने गया था/वह अपनी सांस गवां बैठा" ... एक कविता में वे कहते हैं  :"यह जंग है जीवन बचाने की नहीं/मौत से बचने की जंग है".... वे अस्पताल में बेड नहीं  मिल पाने के अनुभव को शब्द देते हैं : "यह घर नही घर का बिस्तर नहीं/ अस्पताल का बेड है/ इसे पाना भी जंग का जीतना है"।
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कोरोना से मौतें इतनी हो रही हैं कि उनका पंजीयन होना तक मुश्किल है :" लाईन लम्बी है/ पंजीयन दफ्तर का दरवाजा बंद हैं/यह ज़िंदा और मुर्दा के बीच का खेल है"।
दसवीं कविता में सत्तापक्ष और देसी दवाओं के व्यापारी 'बाबा' पर व्यंग्य है  : " हम खुश हैं/दुख में भी खुश होने का दर्शन है अपने पास/हम विश्व गुरु जो ठहरे /........'बाबा'..... इसका पेटेंट है/दुनिया पर हमारा कब्जा है/.....ज्ञान पर गोबर चमक रहा है "। कवि के ही शब्दों में जीवन की प्रयोगशाला से निकली हुई हैं ये कविताएँ। जिन परिस्थितियों से हम निकले, चाहे व्यक्तिगत स्तर पर हो या सामाजिक, उन्हीं पर आधारित हैं ये कविताएँ।
इसके अलावा कौशल  किशोर जी ने पहले की लिखी हुई कुछ महत्वपूर्ण कविताएँ जैसे " निराला जी को याद करते हुए ", " कमीज़", "ठेंगे से" लॉकडाऊन पर एक लंबी कविता 'रोटियां उनकी हत्या की गवाही दे रही थीं' और  " फिलीस्तीन " शीर्षक से मर्मस्पर्शी कविताएँ भी सुनाईं। घंटे भर के इस एकल काव्यपाठ में वरिष्ठ साहित्यकार आदरणीय कौशल किशोर जी ने बेहतरीन प्रस्तुति दी|

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