प्रेम एक ऐसी चीज है जो हारे हुए व्यक्ति को भी जीता देती है। लेकिन घृणा एक पूरी तरह से सफ़ल हुए व्यक्ति को भी नीचे गिरा देती है।

दर्द और बात > जी.एल. चित्रकूटी


 दर्द मीठा होता है

बात कड़वी होती है

कभी कभी बात मीठी होती है 

दर्द कड़वा होता है

कड़वे दर्द के समक्ष अगर मीठी बात 

आ जाए तो दर्द का कड़वापन 

बात की मिठास में विलीन हो जाता है

जैसे ज्यादा चीनी डालने पर 

नींबू का खट्टापन मिठास में बदल जाता है!

दर्द जहां दवा की नहीं  सुनता

वहां बात की मान लेता है।

पर अगर बात कड़वी हो 

दर्द मीठा हो 

तो रास्ता बदल जाता है

उसका रास्ता दवा की असफलता से होते हुए 

श्मशान की ओर मुड़ जाता है

माटी हो जाता है!

क्या?

क्या कहा आपने

 'दवा की असफलता में 

 दवा की जगह दुआ ले लेती है?'

 जी नहीं! 

 आप ग़लत सोचते हैं

 दर्द का रिश्ता दवा के बाद

 बात से है , दुआ से नहीं! 

 जैसे विचार के बाद बात भावना में बह जाती है

 वैसे दवा के बाद दर्द बात हो जाता है!

 जिंदगी हो जाता है

 अमृत की धार और

 जीने का आधार हो जाता है।


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