बदलती संस्कृति-हंसराज हंस

भारतीय संस्कृति पूरी दुनिया में जानी व मानी जाती थी। क्योंकि हमारी संस्कृति वसुधैव कुटुंबकम की रही है। हम हमेशा जियो और जीने दो में विश्वास व आस्था रखने वाले‌ थे। हमने प्रकृति की हर वस्तु को देवतुल्य समझ कर, उसको पूजा है, उसका संवर्धन, संरक्षण करते आ रहे थे। हमारी संस्कृति में हरा पेड़ काटना महापाप माना जाता था। राजस्थान राज्य के खेजड़ली गांव की घटना जैसा उदाहरण पुरे विश्व में दुसरा कोई नहीं मिलता है। इस घटना में एक नही सैकड़ों व्यक्तियों ने पेड़ों के लिए अपना बलिदान दिया था।



हमारी संस्कृति थी एक पेड़ काटो उसकी जगह दूसरा पेड़ जरूर लगाओ। यहां दूध दही की नदियां बहती थी। हमारे देश को सोने की चिड़िया कहते थे। रामराज्य का उदाहरण देते है कि उस समय अपने घरों के कोई भी ताला नहीं लगाता था।मतलब चोर थे ही नही। पर यह सब उस समय था। जब हमारी साक्षरता की दर बहुत कम थी। ज्यों-ज्यों साक्षरता व  शिक्षितों का प्रतिशत बढ़ता गया। सबमें ज्ञान का विकास हुआ। नई-नई तकनीकी का विकास हुआ। उस ज्ञान और तकनीकी के सहारे धीरे-धीरे प्रकृति को चुनौती दी जाने लगी। अब प्रकृति को मां न समझकर एक लाभकारी वस्तु के रूप में माना जाने लगा। उसका  विकास के नाम पर अधिक से अधिक दोहन किया जाने लगा। व्यक्ति लालची व स्वार्थी बन गया। मैं और मेरा परिवार बस और किसी से कुछ मतलब नही। जैसे कुविचार उसके मन में पैदा होने लगे। वसुधैव कुटुंबकम की भावना सिमटकर एकांकीपन पर आ गई। संयुक्त परिवार टूटने लगे। हमारा और हमारे बच्चों का विकास हो बस यही सोच रह गई। समाज व  देश की कोई  बात नहीं करता। हमेशा हाय पैसा, हाय पैसा, कमाने की रट लगाए रहता। रात दिन पैसा कमाने की भावना से, दया, परोपकार, सहयोग की भावना कम होती गई। अहंकार,मेरा जैसा कोई नही,दुसरो का शोषण करके, अधिक मुनाफा कमाने के भाव, स्वार्थ की भावना पनपने लगी। दान पुण्य आदि कार्य बेकार लगने लगे। बड़ों की बात बुरी लगने लगी। उनका मान सम्मान कम होने लगा। समाज में गैर बराबरी उच्च वर्ग निम्न वर्ग का दायरा बढ़ता गया। नैतिक मूल्य ईमानदारी, संवेदनशीलता, परस्पर सहयोग व आदर- सम्मान  की बातें किताबों तक ही सीमित रह गई।पढ़े-लिखे लोग, अनपढ़ों से जायदा गैर जिम्मेदार व्यवहार करने लगे।हम सब आए दिन समाज में मासूमों के साथ गैंगरेप की घटनाओं के बारे में खूब सुनते हैं, समाचार पत्रों में पढ़ते है।यह सब देखकर तो ऐसा लगता है कि मानव- आदि मानव ही बना रहता तो अच्छा रहता। इसने इतना ज्ञान विज्ञान पाकर भी क्या सीखा? पूरे विश्व में कहीं भी शांति व खुशहाली नजर नही आती है। हम सारा ठीकरा पाश्चात्य संस्कृति व आधुनिकता के नाम पर फोड़ते है।

पर इस तरह के मासूमों के साथ गैंग रेप की घटनाएं तो मेरा मानना है किसी भी देश की संस्कृति में नही है।

यह तो हमारी पाशविक प्रवृत्ति का ही द्योतक है।इन सब सांस्कृतिक मूल्यों बदलाव से हमारा सामाजिक ताना-बाना छिन्न-भिन्न हो गया है। मां- बाप को अनाथालय की शरण में जाना पड़ रहा है। नारी सम्मान, बालिका शिक्षा, स्वच्छता आदि विषयों पर कई शताब्दियों से काम हो रहा है पर अभी भी हमें इनके लिए करोड़ों रुपए का बजट खर्च करना पड़ रहा है।हम कैसे संस्कृति बनाते जा रहे है?भावी पीढ़ी को हम कौनसी संस्कृति देकर जाएंगे। हम सब के सामने यह एक बहुत बड़ा यक्ष प्रश्न है?

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