प्रेम एक ऐसी चीज है जो हारे हुए व्यक्ति को भी जीता देती है। लेकिन घृणा एक पूरी तरह से सफ़ल हुए व्यक्ति को भी नीचे गिरा देती है।

शिक्षक बनाम सृजनशीलता - मास्टर हंसराज हंस

बच्चे स्वभाव से ही चंचल होते है। उनकी इस चंचलता को दिशा देने की बहुत जरूरत होती है। बच्चे एक ही तरह का कार्य ज्यादा देर तक करने में, एक ही स्थान पर बैठने मे, चुपचाप बैठे रहने में, ज्यादा देर तक सुनने में, ऊभाव महसूस करते है। और प्रायः विद्यालयों में बच्चों को चुपचाप बैठकर पढ़ने पर ही शिक्षक ज्यादा बल देते है।अधिकांश विद्यालयों मे शिक्षको द्वारा इन अरूचि पूर्ण कार्यो के बारे में बच्चों को बार-बार समझाते हुए देखा जा सकता है।इस समझाइश में ही शिक्षको आधी उर्जा प्रतिदिन विद्यालयों मे खर्च हो जाती है। अंत: शिक्षक को कक्षा-कक्ष में बच्चों का मन लगाना है। तो उसे बच्चों की
सर्जनशीलता के गुण को काम में लेना होगा। बच्चों को नए-नए चित्र बनाने, मिट्टी व कागज के खिलौने बनाने, समुह मे चर्चा करने, कहानी, कविता लिखने पढ़ने, सुनने, नाटक करने,खेल खेलने, लकड़ी के टुकड़ों से आकृतियां बनाने, प्लेस कार्ड को देखकर चित्र पठन, वर्ण पठन, शब्द पठन, कंकड़ो, तिल्लियों, कंचों से खेलने में, कपड़े से गूड्डा- गूड्डी बनाने में, चित्रों में रंग भरने में, सजावट करने में, मंजीरे बजाने में, गाना गा ने मे (हारमोनियम) बजाने में, नाचने में,स्लेट पर गोले बनाने में, स्लेट पेंसिल से स्लेट पर खेलने में, दर्पण में मुंह देखने में, पशु, पक्षियों की कहानियां सुनने, आदि कई तरह के सृजनात्मक कार्यो के माध्यम से ही शिक्षण करवाना चाहिए। बच्चों को इन सब रचानात्मक कार्यो को करने में बहुत आनंद आता है। आनंद आने से कार्य करने में उनकी रुचि, जिज्ञासा बढ़ती है। 
जो शिक्षक बच्चों में जिज्ञासा, रुचि पैदा करने में सफल होता है।वही अच्छा व सफल शिक्षक कहलाता है। बच्चों को उनकी रुचि के अनुसार जो शिक्षण करवाया जाता है। उसमें बच्चों को आनंद की अनुभूति होती है।उनकी सीखने की जिज्ञासा बढ़ती है। उनका सीखना-सीखाना बहुत ही सहज और सरल हो जाता है।
इन सब कार्यों को करके शिक्षक बच्चों की नैसर्गिक प्रतिभा का विकास करता है। नित नए रचना करने,नई नई खोज करने नया सृजन करने के मौके देने से बच्चों मे व्याप्त क्षमताओं का विकास ही नही होता वरन उनमे निखार भी आता है।इन सब कार्यों को बच्चें अच्छे तरीके से मन लगाकर करे,इसके लिए शिक्षक को चाहिए कि वह विधालय व कक्षा-कक्ष में बच्चों को भयमुक्त  माहौल‌ प्रदान करे। कक्षा-कक्ष का ऐसा वातावरण हो की बच्चे बेझिझक, संकोच के अपनी बात शिक्षक को बता सके। बच्चों को खूब सारे गलतियों से सीखने के अवसर देना भी अत्यंत आवश्यक है। बच्चे गलतियां करने से डरे नही, क्योंकि गलतियों से बच्चों का सीखना होता है। यह बात प्रत्येक शिक्षक को याद रखनी चाहिए।
विद्यालयों मे लगातार इस तरह के रचनात्मक कार्य शिक्षकों को करते रहना होगा।इनके करने से बच्चों को हम अच्छा पत्रकार, अच्छा चित्रकार, अच्छा खिलाड़ी, कुशल वक्ता, अच्छा संगीतकार, अच्छा नर्तक आदि बना सकते है।उनका मोह सरकारी नौकरी से भी हटाने मे हम सफल होगें।
क्योंकि हम देख रहे है।आजकल शिक्षा का उद्देश्य केवल सरकारी नौकरी लगना ही माना जाने लगा है।जबकि शिक्षा के यह उद्देश्य तो बिल्कुल भी नही था।
*राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की बुनियादी शिक्षा*  भी इस बात की ही वकालात करती थी। उन्होंने जो बात बताई थी‌ वह भी सृजनात्मकता से जुड़ी हुई थी।
*वह कहते थे कि विद्या मंदिरों में जब तक बच्चों को हाथ, मन और मस्तिष्क तीनों से होने वाले कार्य नहीं करवाए जाएंगे*। *तब तक शिक्षा से बच्चों का सर्वांगीण विकास नही हो सकता है*। *वे केवल अंक प्राप्त करने वाली मशीन ही बनकर रह जायेंगे*।
बच्चों में जीवन मूल्यों का विकास तब ही होगा जब उनको ज्यादा से ज्यादा रचनात्मकता, सृजनात्मकता के काम विद्यालयों में शिक्षकों द्वारा करवाये जायेंगे। क्योंकि समाज को प्रतिभाशाली ही नही सृजनशील व्यक्तियों की ज्यादा जरुरत है।जरुरी नही है की जो बच्चा प्रतिभाशाली है  व सृजनशील भी हो,पर यह जरुर है की हर सृजनात्मक बच्चा प्रतिभाशाली होता है।समाज में सृजनात्मक बच्चों की ज्यादा आवश्यकता है। क्योंकि वही नया खोजते है,नया रचते है। उनमें ही समाज मे बदलाव लाने का हौंसला होता है। *मेरा तो यही मानना है की सबसे अच्छी शिक्षा वही है जो बच्चों को अच्छा जीवन जीने मे का हौंसला प्रदान करें*।
इन रूचिपूर्ण कार्यो के करने से बच्चों में नैतिक मुल्यों का विकास होता है। बच्चे कब कौनसी जीवनोपयोगी बात सीख जाते है, पता ही नही चलता।  जैसे- एक दूसरे का सहयोग करना, अपनी बारी का इंतजार करना, नेतृत्व करना, निर्णय लेना, तर्कपूर्ण बात करना, प्रश्न पूछना, आत्मविश्वास, संवेदनशीलता,सबका  आदर करना, सम्मान करना, सबके साथ शांति से रहना, सबको बराबर समझना, सबके साथ न्याय पूर्ण व्यवहार करना आदि।
मानवीय मूल्यों को नही सीखने वाले विद्यार्थी महज अंक व डिग्री प्राप्त करने वाली मशीन बन कर रह जाते है।
समाज में वह नया बदलाव नहीं कर सकते है। केवल नौकरी पाकर अपना गुजारा कर सकते है। इसके अलावा उनमें सामाजिकता का पूर्ण अभाव रहता है‌।
हम सब देख भी रहे है। हमारे देश में करोड़ों की संख्या में शिक्षित है। *आपको ताज्जुब होगा यह जानकर ज्यों- ज्यों शिक्षितों की दर बढ़ी है त्यों-त्यों ही अपराध का प्रतिशत भी बढ़ा है।साथ ही  अपराध करने वालों की लिस्ट देखेंगे तो उनमें भी उच्च शिक्षा प्राप्त, बड़ी-बड़ी डिग्रियां लेने वाले ही शामिल पाए जाते है*। *इसका मतलब क्या हुआ? उन्होंने केवल नौकरी पाने के लिए पढ़ा था। जब नौकरी नहीं मिली तो वह सामाजिक नही हो पाये। बल्कि समाज के लिए समाज कंटक बन गए‌‌*।
जब तक बच्चों में मानवीय मूल्यों का विकास नहीं होगा। हमारे शिक्षा अधूरी ही मानी जाएगी।
इसलिए एक शिक्षक को बच्चों को एक अच्छा नागरिक बनाना है तो उसको बच्चों को ज्यादा से ज्यादा सृजनशीलता का काम विद्यालयों में करवाना ही पड़ेगा।
रचनात्मक कार्यों में बच्चों की पूर्ण सहभागिता‌‌ हो रही है,उनको आनंद आ रहा है आदि बातों का शिक्षक को लगातार अवलोकन करते रहना होगा। शिक्षक को चाहिए कि वह सारा कार्य बच्चों को ही करने दे।।वह तो केवल एक मार्गदर्शक की भूमिका मे बना रहे। बच्चों को ही सोचने दे, जूझने दे, विचार करने दे, आपस में संवाद करने दे, समुह मे विमर्श करने दे, निष्कर्ष पर पहुंचने दे, निर्णय लेने दे।
शिक्षक यह सब करेंगे तो निश्चित रूप से बच्चों के मानसिक विकास में भी उतरोतर वृद्धि होगी इसमें कोई अतिशयोक्ति नही है।
इन सब कार्यो के करने से बच्चों का थिंकिंग (सोचना)पावर भी बढ़ेगा।बच्चे क्या, क्यों और कैसे से बनने वाले प्रश्नों के हल के बारे में सोचने लगते है।
जब यह सब होने लगेगा तो फिर बच्चे किसी के भी पिछलग्गू नही बनेंगे।खुद अपना निर्णय लेकर अपना भावी जीवन आनंद के साथ व्यतित करेंगे।जो की शिक्षा का मूल उद्देश्य है,उसको प्राप्त करने में हम कामयाब हो सकेंगे।
*यह सब कार्य करने के लिए शिक्षक को अधिक धन की नही केवल अपने मन की जरूरत है*।
मास्टर हंसराज हंस
मास्टर हंसराज हंस - राजस्थान 

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