प्रेम एक ऐसी चीज है जो हारे हुए व्यक्ति को भी जीता देती है। लेकिन घृणा एक पूरी तरह से सफ़ल हुए व्यक्ति को भी नीचे गिरा देती है।

बिरसा मुंडा के प्रति - जी.एल. चित्रकूटी

 

कवि जी.एल. चित्रकूटी


पहाड़ निरंतर छलनी हो रहे हैं

नदियों की प्यास गहराती जा रही है

पेड़ भयानक त्रासदी झेल रहे हैं

धरती बेपर्द होती जा रही है!

पत्तियां दिन प्रतिदिन

उदास होती जा रही हैं

फूलों की खुशबू गायब होती जा रही है

कोयल अब नहीं बोलती 

पंछी चुप हैं!

बोलती हैं तो बस मशीनें!

रात दिन वही मशीनें!!

गौरइया का घर उजड़ रहा है 

पेड़ रात दिन सोते नहीं हैं , 

इसी चिंता में

कि कहीं से भरभराती कोई मशीन न आ जाए

दम घुट रहा है उनका

जंगल डरा हुआ है

 सहमा हुआ है

 एक कोने में छिपा तुम्हारी राह देख रहा है

 उसे पता है कि एक दिन तुम ज़रूर आओगे 

 किसी न किसी रूप में दोबारा उसके लिए लड़ोगे

 वो पूछ रहा है तुमसे  

 आओगे!

 बोलो! तुम अब कब आओगे?

अब कब उठाओगे तीर कमान 

 हमारी रक्षा के लिए 

 कब छेड़ोगे उलगुलान

 कब करोगे पुन:  हमारा श्रृंगार 

हमें बचाओगे

 वो मेरे बिरसा... वो मेरे आबा...

  तुम कब आओगे?

॥ लेखक के बारे में ॥ 

नाम : जी.एल. चित्रकूटी 

स्थाई पता  -  ग्राम  : बगरेही 

पोस्ट  : भौंरी तहसील  : मानिकपुर

जनपद  : चित्रकूट   ( उत्तर प्रदेश) 210205

शिक्षा :  एम. ए. , 

छात्र : महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा 442001

• साहित्यिक और सामाजिक विषयों पर निरंतर लेखन

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