प्रेम एक ऐसी चीज है जो हारे हुए व्यक्ति को भी जीता देती है। लेकिन घृणा एक पूरी तरह से सफ़ल हुए व्यक्ति को भी नीचे गिरा देती है।

‘दर्द के काफ़ि़ले’ संग कविता का सफर - कौशल किशोर


मानव जीवन महामारी, अकाल, दुर्भिक्ष, बाढ,़ भूकंप, सुनामी, भूस्खलन, ज्वालामुखी का विस्फोट जैसी अनेकानेक व्याधियों और विभीषिकाओं से भरा है। यह उसके सभ्यता संघर्ष का हिस्सा रहा है जो मनुष्य के सांस्कृतिक सृजन तथा विविध कला रूपों में व्यक्त हुआ है। इन्हें मात्र दैविक व प्राकृतिक आपदा नहीं माना जा सकता है। अधिकांश में मानव व्यवस्था की भूमिका है। आधुनिक युग को तो महामारियों का युग कहां गया है। एक महामारी का प्रकोप थमता नहीं कि दूसरी पैदा हो जाती है जो पहले की तुलना में ज्यादा घातक, जानलेवा और आक्रामक होती है। इस संबंध में सत्ता व्यवस्था की भूमिका हमेशा संदिग्ध रही है। 

हाल के वर्षों में जितने संक्रमण हुए हैं, कोरोना वायरस सबसे अधिक जानलेवा साबित हुआ है। इसे खतरनाक और महामारी फैलाने वाले वायरस के रूप में चिन्हित किया गया। औद्योगिक मीट उत्पादन, पर्यावरण के बिगड़ते हालात, ग्लोबल वार्मिग आदि माहामारियों के कारण हैं। ‘बिग फार्मस मेक्स बिग फ्लू’ जैसी मशहूर किताब के लेखक जीव विज्ञानी राब वालस कहते हैं ‘जो भी यह समझना चाहता है कि वायरस लगातार इतने घातक क्यों होते जा रहे हैं, उन्हें खेती के औद्योगिक माॅडल विशेषकर पशु उत्पादन के औद्योगिक माॅडल की पड़ताल करनी होगी। ....ये कंपनियां अपने यहां ना सिर्फ मीट का उत्पादन करती हैं बल्कि इसके साथ ही गंभीर बीमारी पैदा करने वाले वायरस की भी खेती करती है। एक शब्द में कहे तो पूंजीवाद को समझना होगा’। 

सार रूप में कहें तो माहामारियों के पीछे बड़ा करण पूंजीवादी व्यवस्था है। यह ऐसी व्यवस्था है जो अपने मुनाफे के भंडार को बढ़ाने के लिए श्रम का शोषण ही नहीं करती बल्कि शोषण का विस्तार वह नये-नये क्षेत्र में करती है। नये तरीके का इस्तेमाल होता है। उनका शिकार प्रकृति होती है। उसका दोहन होता है। पर्यावरण नष्ट किया जाता है। दुष्परिणाम पूरी मानव जाति को भोगना पड़ता है। बीते सौ साल में दुनिया दस महामारियों की चपेट में आयी। देखा गया कि जब भी नया वायरस आया, वह पहले की तुलना में ज्यादा ताकतवर रहा। इस व्यवस्था को समझे बिना कोरोना वायरस के संक्रमण को नहीं समझा जा सकता। आज इसके जबड़े में सारी दुनिया है। इसे कोविड-19 नाम दिया गया है। इसने जीवन के लिए संकट पैदा किया है। इसकी वजह से कई नए शब्द हमारी जीवन-चर्या में शामिल हुए हैं। लोगों की जीवन शैली बदली है। मानसिक तनाव, बेचैनी, घरेलू हिंसा, अकेलापन, आपसी दूरी, आत्महत्या और असामाजिकता अपने चरम पर है। 

आज मानव जाति मुसीबत में है। मुसीबत में क्या कविताएं साथ होंगीं? हिन्दी के एक वरिष्ठ कवि का यह प्रश्न है। इसमें उत्तर भी निहित है। ब्रेख्त भी कहते हैं ‘जुल्मतों के दौर में/क्यो गीत गाये जायेंगे/हां, जुल्मतों के बारे में भी/गीत गाये जायेंगे’। कविता का काम है कि मानव-मन में जो घटित होता है, उसे पकड़े और व्यक्त करे। कविता इस मन के पास, उसके भाव और संवेदना के पास सबसे पहले पहुंचती है। कोरोना काल में ढेर सारी कविताएं लिखीं गयीं, लिखी जा रही हैं। यह निरन्तर जारी है। यह अपने समय में कविता का हस्तक्षेप है। बहुत से लोग कहते हैं, उनके सवाल भी है कि क्या इतने तात्कालिक विषय को लेकर कविताएं लिखी जाय? वे कविता की शाश्वता की बात करते हैं। इस बारे में मेरा मत है कि कविता का सम्बन्ध अपने समय से होता है। जो कविताएं अपने समय में होती हैं, वे ही अपने समय को रचती हैं और उनका अतिक्रमण भी करती हैं, उसके पार जाती हैं। मतलब, कालजीवी होकर ही वह कालजयी बनती है। मुक्तिबोध ने भी कविता की तमाम विशेषताओं में इसे पहली खासियत के रूप में चिन्हित किया है। वे कहते हैं ‘नहीं खत्म होती/कविता कभी खत्म नहीं होती/वह आवेग त्वरित कालयात्री/.....परम स्वाधीन जनचरित्री’’। आशय है कि कविता में आवेग के साथ त्वरण हो और इसके साथ वह कालयात्री भी हो।  उसका चरित्र स्वाधीन और जनपक्षधर हो। यदि कोरोना काल में बड़े पैमाने पर कविताएं लिखी गयीं तथा लिखी जा रही हैं तो यह कवि और कविता की सामाजिक भूमिका है। इस दौर की कविताओं में एक तरफ भाव व संवेदना की अभिव्यक्ति है तो वहीं विचार की भी। इनमें चिन्ता व चिन्तन दोनों मिलेगा। ये कोरोना तक सीमित नहीं हैं बल्कि इनका फलक कोरोना के पार जाता है। अमेरिका में अश्वेत जार्ज फ्लाॅयड की हत्या की जाती है, उसकी गूंज ही नहीं, भीमा कोरेगांव से लेकर शाहीनबाग तक के प्रतिरोध का स्वर इस दौर की कविता में सुनाई पड़ता हैं। यहां दुनिया की पड़ताल है। दुनिया की व्ववस्था कैसी बनायी गयी है, इसकी पड़ताल है। कोराना के खिलाफ जो जंग है, जिस तरह मानव समाज इस जंग में है, उसी तरह कविताएं भी इसमें शामिल है। उसकी चिन्ता में ये सवाल भी है कि दुनिया कैसी बनी/बनायी गयी? और कैसी दुनिया हमें चाहिए?

आज कोरोना को लेकर इससे संबंधित अर्थनीति, राजनीति, आतंक, संस्कृति पर विचार हो रहा है। रचना और रचनाकार भी इन बहसों से बाहर नहीं है। कविता भी इनसे परे नहीं है। सोशल मीडिया रचना और विचारों को व्यक्त करने का माध्यम बनी है। कविताएं फेसबुक और अन्य माध्यमों से सामने आयी हैं। स्त्री रचनाकारों ने कविताएं लिखी हैं। कविता की विभिन्न शैलियों में रचनाएं लिखी गयीं। हाशिए के समाज से आये रचनाकारों ने एसर्ट किया है। लाॅकडाउन  के बाद सन्नाटे  जैसी स्थिति थी। सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियां ठप थीं। नयी पहल की जरूरत थी। इसी के तहत कोरोना काल में लिखी कविताओं के पाठ-कार्यक्रम की शुरुआत हुई। फेसबुक माध्यम बना। ‘कविता संवाद’ का पहला कार्यक्रम  6 अप्रैल 2020 को शुरू हुआ और 20 वां कवि वीरेन डंगवाल के जन्मदिन 5 अगस्त 2020 पर किया गया। सौ के आसपास कवियों की करीब दौ सौ कविताएं इस मंच से पढ़ी गयीं। कोरोना काल की कविताओं का संकलन ‘दर्द के काफ़िले’ इन्हीं कविताओं से तैयार हुआ है। इसमें विजेन्द्र, रामकुमार कृषक, असद जैदी, विष्णु नागर, शोभा सिंह, सरला माहेश्वरी जैसे वरिष्ठ कवि-कवयित्रियों से लेकर नवोदित कवि तक शामिल हैं। 87 कवियों की कविताओं का यह सफर हमारे समय का सृजनात्मक दस्तावेज है।

किसी भी नयी महामारी के सम्बन्ध में अन्ततः वैज्ञानिकों की भूमिका ही अहम होती है। अपने अथक प्रयत्न से वे वायरस की काट खोज लाते हैं। जन स्वास्थ्य को मजबूत बनाकर ही ऐसे वायरस का मुकाबला किया जा सकता है। वही, जन स्वास्थ्य भी एक नयी जन-व्यवस्था के बिना प्राप्त नहीं हो सकता। कोराना महामारी से संघर्ष व चिन्तन की दो विपरीत दिशा है। पहली, कुछ हैं जो उन पुरानी स्थितियों को वापस प्राप्त करना चाहते हैं, कोरोना से पहले की हालत लौट आये अर्थात उसी पूंजीवादी व्यवस्था को प्राप्त करना उनका मकसद है। दूसरी दिशा इसके विरुद्ध है। इस संबंध में अरुंधती राय कहती हैं ‘ऐतिहासिक रूप से, वैश्विक महामारियों ने इंसानों को हमेशा अतीत से विच्छेद करने और अपने लिए एक बिल्कुल नई दुनिया की कल्पना करने को बाध्य किया है। यह महामारी भी वैसी ही है। यह एक दुनिया और अगली दुनिया के बीच का मार्ग है, प्रवेश द्वार है। हम चाहें तो अपने पूर्वग्रहों और नफरतों, अपनी लोलुपता, अपने डेटा बैंकों और मृत विचारों, अपनी मृत नदियों और धुंआ भरे आसमानों की लाशों को अपने पीछे-पीछे घसीटते हुए इसमें प्रवेश कर सकते हैं। या हम हल्के-फुल्के अंदाज से बिना अतीत का कोई बोझ ढोए एक नई दुनिया की कल्पना और उसके लिए संघर्ष की तैयारी कर सकते हैं।’                                                             एफ - 3144, राजाजीपुरम, लखनऊ - 226017  मोबाइल - 8400208031

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