बेचैनियां || मुझे सुकून तलाशना होता है….

मुझे सुकून तलाशना होता है।
मैं जा बैठता हूँ
कहीं एकांत में
जंहा
पहुँच न सके
नासा की नज़र भी।
मगर कमबख्त
दिल कँहा समझता है
विज्ञानं की जटिलता को।
गुरुत्वाकर्षण नहीं खिंच पाता
मुझे।
उड़ने लगता हूँ उसकी यादों में
अंतहीन आसमान में ।
मैं चिल्लाता रहता हूँ
“और कितना खींचोगे टूटने की हद तक”
सुकून फिर चल पड़ता अज्ञात राहों पर
उसकी यादें कर लेती है
मुझ पर किसी पूंजीवादी की तरह
आधिपत्य।
पास रहती है शेष सिर्फ
बेचैनिया।

पवन’अनाम’

मैं अक्सर भूल जाता हूँ,
कभी किताबें अलमारी के ऊपर रखकर,
कभी चस्मा को सिर पर रखकर,
कभी चाय को गिलास में रखकर
तो कभी लिखते वक्त
शब्दो की सीमाएं।
कभी सफर करते वक़्त
या तो नींद में चला जाता
या किराया देना भूल जाता हूं,
यहां तक के कहाँ उतरना है?
क्यों उतरना है?
सब याद करना पड़ता है।
तुम भी ना ज़िन्दगी में जुल्म ढाने आई हो,
मैं एक हफ़्ते पहले
अपने गांव का सबसे अक्लमंद लड़का था।

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