प्रेम एक ऐसी चीज है जो हारे हुए व्यक्ति को भी जीता देती है। लेकिन घृणा एक पूरी तरह से सफ़ल हुए व्यक्ति को भी नीचे गिरा देती है।

“ले मशाल चल पड़े हैं लोग मेरे गाँव के”- गीतकार बल्ली सिंह चीमा

“ले मशाल चल पड़े हैं लोग मेरे गाँव के” के रचनाकार और जनपक्षधर कवि- गीतकार बल्ली सिंह चीमा ( Balli Singh Cheema ) का जन्मदिन है।
तेरे मेरे गाँव न पहुंची आजादी ने हद कर दी ।
गाओं गाओं जा पहुंची है महंगाई ने हद कर दी ।
आधी सदी लगी खद्दर को अपना रंग बदलने में
कुछ बरसों में बना चैंम्पियन भगवाजी ने हद कर दी।
झूठे वादों से शर्मिंदा थी चुप्पी मनमोहन की
बेशर्मी से बोल रहे हैं जुमलों ने तो हद कर दी ।
जब भी आएंगे अच्छे दिन बतला कर ही आएंगे
बिना बताये आ पहुंचे हैं बुरे दिनों ने हद कर दी।
हिटलर की औलाद हुई अब जवां हमारे देश में
ये सच्च इतनी देर में जाना हम लोगों ने हद कर दी
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रोटी मांग रहे लोगों से किसको खतरा होता है
यार, सुना है लाठी-चारज, हलका-हलका होता
सिर फोड़ें या टाँगें तोड़ें, ये कानून के रखवाले,
देख रहे हैं दर्द कहाँ पर, किसको कितना होता है ।
बातों-बातों में हम लोगों को वो दब कुछ देते हैं,
दिल्ली जा कर देख लो कोई रोज़ तमाशा होता है ।
हम समझे थे इस दुनिया में दौलत बहरी होती है,
हमको ये मालूम न था कानून भी बहरा होता है ।
कड़वे शब्दों की हथियारों से होती है मार बुरी,
सीधे दिल पर लग जाए तो ज़ख़्म भी गहरा होता है ।
ले मशालें चल पड़े हैं लोग मेरे गाँव के ।
अब अँधेरा जीत लेंगे लोग मेरे गाँव के ।
कह रही है झोपडी औ’ पूछते हैं खेत भी,
कब तलक लुटते रहेंगे लोग मेरे गाँव के ।
बिन लड़े कुछ भी यहाँ मिलता नहीं ये जानकर,
अब लड़ाई लड़ रहे हैं लोग मेरे गाँव के ।
कफ़न बाँधे हैं सिरों पर हाथ में तलवार है,
ढूँढने निकले हैं दुश्मन लोग मेरे गाँव के ।
हर रुकावट चीख़ती है ठोकरों की मार से,
बेडि़याँ खनका रहे हैं लोग मेरे गाँव के ।
दे रहे हैं देख लो अब वो सदा-ए-इंक़लाब,
हाथ में परचम लिए हैं लोग मेरे गाँव के ।
एकता से बल मिला है झोपड़ी की साँस को,
आँधियों से लड़ रहे हैं लोग मेरे गाँव के ।
तेलंगाना जी उठेगा देश के हर गाँव में,
अब गुरिल्ले ही बनेंगे लोग मेरे गाँव में ।
देख ‘बल्ली’ जो सुबह फीकी दिखे है आजकल,
लाल रंग उसमें भरेंगे लोग मेरे गाँव के ।
– सतीश छिम्पा

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