प्रेम एक ऐसी चीज है जो हारे हुए व्यक्ति को भी जीता देती है। लेकिन घृणा एक पूरी तरह से सफ़ल हुए व्यक्ति को भी नीचे गिरा देती है।

कंप्यूटर रो आयो जमानो............राजस्थानी कविता |

ये राजस्थानी भाषा में कविता हमें सोशल मिडिया से प्राप्त हुई लेखक का नाम पता नहीं हैं ,अगर आपको इस कविता के लेखक के बारें में जानकारी हो तो कमेंट बॉक्स में टिप्पणी करें। भूलग्या- राजस्थानी भाषा की कविता जो बीते जमाने की याद दिलाती है,ये कविता अहसास दिलाती हैं कि आगे बढ़ने की दौड़ मे हम क्या पीछे छोड़ आये हैं।



कंप्यूटर रो आयो जमानो कलम चलाणीं भूलग्या,
मोबाईल में नंबर रेग्या लोग ठिकाणां भूलग्या।
धोती पगडी पाग भूलग्या मूंछ्यां ऊपर ताव भूलग्या,
शहर आयकर गांव भूलग्या बडेरां रा नांव भूलग्या ।
हेलो केवे हाथ मिलावे रामासामा भूलग्या,
गधा राग में गावणं लाग्या सा रे गा मा भूलग्या ।
बोतल ल्याणीं याद रेयगी दाणां ल्याणां भूलग्या,
होटलां रो चस्को लाग्यो घर रा खाणां भूलग्या ।
बे टिचकारा भूलगी ऐ खंखारा भूलग्या ,
लुगायां पर रोब जमाणां मरद बिचारा भूलग्या ।
जवानी रा जोश मांयनें बुढापा नें भूलग्या ,
हम दो हमारे दो मा बापां ने भूलग्या ।
संस्क्रति नें भूलग्या खुद री भाषा भूलग्या,
लोकगीतां री रागां भूल्या खेल तमाशा भूलग्या ।
घर आयां ने करे वेलकम खम्मा खम्मा भूलग्या,
भजन मंडल्यां भाडा की जागण जम्मा भूलग्या ।
बिना मतलब बात करे नीं रिश्ता नाता भूलग्या,
गाय बेचकर गंडक ल्यावे खुद री जातां भूलग्या ।
कांण कायदा भूलग्या लाज शरम नें भूलग्या,
खाणं पांण पेराणं भूलग्या नेम धरम नें भूलग्या ।
घर री खेती भूलग्या घर रा धीणां भूलग्या,
नुवां नुंवां शौक पालकर सुख सुं जीणां भूलग्या ।

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